वृद्धदारु
समुंद्रशोभा
मल्लिका
अरण्यजटा
बल्यवल्ली
बहुवर्षीय, चढ़ने वाली लता
भारत के उष्णकटिबंधीय व उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में जंगलों, झाड़ियों और खुले क्षेत्रों में पाई जाती है। विशेषतः पश्चिमी घाट, मध्य भारत और बंगाल क्षेत्र में पाई जाती है।
Alkaloids (ergoline group)
Glycosides
Resins
Starch
Fatty acids (in seeds)
Flavonoids
Rasa- मधुर, तिक्त
Guna- गुरु, स्निग्ध
Virya- उष्ण
Vipaka- मधुर
Karma- बबल्य, वृष्य, रसायन, मेध्य, शुक्लवर्धक, वातहर, ज्वरहर
Doshakarma- वात व कफ शामक
वाजीकरण और पुरुष बांझपन में
मानसिक दुर्बलता और स्मृति दोष में
वातरोग, आमवात, स्नायविक कमजोरी
बुढ़ापे से संबंधित दुर्बलता
नपुंसकता, शीघ्रपतन, शुक्रदोष
शरीर की पोषण शक्ति बढ़ाने हेतु
बालकों के लिए बृंहण एवं बल्य औषध
मूल (जड़)
बीज (वाजीकरण हेतु)
पत्तियाँ और पुष्प (लेप रूप में)
मूल चूर्ण: 3–6 ग्राम
बीज चूर्ण: 1–3 ग्राम
क्वाथ (मूल का): 40–60 मि.ली
वृद्धदारु चूर्ण
वाजीकरण वटी
बल्य पाक
अश्वगंधादि वटी में सहगटक
वृद्धदारु गुरु स्निग्धा बल्या वृष्या रसायनी।
वातश्लेष्महरा तिक्ता शीतला मेध्यकारिणी॥
वृद्धदारू, समुंद्रशोभा, बढ़
Elephant Creeper
Argyreia speciosa Sweet
Convolvulaceae (कलमी कुल)
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